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من‌ ‌روائع‌ الكاتب ‌أحمد‌ ‌مطر‌ ‌‌

‌ ‌
‌دخل‌ ‌لص‌ ‌خلسةً‌ ‌الى‌ ‌داري‌ ‌فسرق‌ ‌ساعتي‌ ومزهرية‌ ‌الورد‌ ‌وقلادتي‌ ‌

بحثت‌ ‌في‌ ‌كل‌ ‌مكان‌ ‌عن‌ ‌لص‌ ‌سرق‌ ‌متاعي‌ ‌

بحثت‌ ‌عنه‌ ‌في‌ ‌الأسواق‌ ‌وفي‌ ‌السجون لعلي‌ ‌أستعيد‌ ‌مالي‌
‌ ‌ ‌
فلم‌ ‌أجده‌ ‌فقررت‌ ‌أن‌ ‌أذهب‌ ‌الى‌ ‌الشرطة‌ ‌ببلاغي‌ ‌

دخلت‌ ‌الى‌ ‌قائد‌ ‌الشرطة‌ ‌لكي‌ ‌يقبض‌ ‌على‌ ‌لص‌ سرق‌ ‌داري‌ ‌

بدأت‌ ‌أبلغه‌ ‌فرأيت‌ ‌بيده‌ ‌ساعةً‌ ‌تشبهُ‌ ‌ساعتي‌ ‌

فقلت‌ ‌يا‌ ‌سيدي‌ ‌عذرآ‌ ‌ربما‌ ‌قبضتم‌ ‌على‌ ‌سارق‌ ‌داري‌ ‌

فهذه‌ ‌الساعة‌ ‌التي‌ ‌في‌ ‌يدك‌ ‌ورثتها‌ ‌عن‌ ‌أبي‌ ‌وأجدادي‌ ‌

نظر‌ ‌نحوي‌ ‌بخبث‌ ‌وقال‌ ‌يا‌ ‌حراس‌ ‌أدخلوه‌ ‌سجن‌ ‌انفرادي‌ ‌

بعد‌ ‌عام‌ ‌اُطلق‌ ‌سراحي‌ ‌فقررت‌ ‌أن‌ ‌أذهب‌ ‌إلى‌ ‌القاضي‌ ‌

أشتكي‌ ‌قائد‌ ‌الشرطة‌ ‌ولص‌ ‌ٍ‌ ‌يعبثُ‌ ‌بداري‌ ‌

وقفت‌ ‌أمام‌ ‌قاضي‌ ‌القضاة‌ ‌أبحث‌ ‌عن‌ ‌حقي‌

فرأيت‌ ‌أمامه‌ ‌مزهرية‌ ‌أزهاري‌ ‌

قلت‌ ‌يا‌ ‌سيدي‌ ‌القاضي‌ ‌هل‌ ‌قبضتم‌ ‌على‌ ‌اللص‌ ‌الذي‌ ‌سرق‌ ‌داري‌

فهذه‌ ‌المزهرية‌ ‌ملكي‌ ‌وفيها‌ ‌كنت‌ ‌أضع‌ ‌أزهاري‌ ‌

صمت‌ ‌الجميع‌ ‌بما‌ ‌فيهم‌ ‌أنا‌ ‌

بعد‌ ‌أن‌ ‌صرخ‌ ‌ ‌القاضي
‌ ‌
يا‌ ‌حراس‌ ‌خذوا‌ ‌هذا‌ ‌المجنون‌ ‌من‌ ‌أمامي‌ ‌

وعلِّموه‌ ‌ ‌كيف‌ ‌يحترم‌ ‌القاضي‌ ‌

تذكرت أني كنت في حضرة القاضي

ذهبت مسرعاً ومستنجداً إلى سيدي الوالي

شرحت كل شيء بالتفصيل الممل

هذا يا سيدي ما جرى لي

اللص وقائد الشرطة وقاضي القضاة كلهم صاروا أعدائي

نظر الوالي إليَّ مُتبَسَّمآ وقال أخشى أن تقول بأن قلادتك هي التي يلبسها الوالي

نظرت إلى قلادتي معلقة في عنق الوالي

وفهمت الدرس أخيراً بأني وما أملك ملكاً للوالي

فلم يدخل اللص داري أبداً وإنما أنا كنت اللص في داري.

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